मैं ये बात बहुत जिम्मेदारी से कह रहा हूँ —
मिलावटी घी और पनीर से होने वाली बीमारियां अचानक नहीं होतीं।

ये बात मुझे तब समझ आई, जब 2023 में मेरे एक करीबी रिश्तेदार, रमेश जी (उम्र 48), लगातार पेट दर्द और जलन की शिकायत करने लगे। शुरुआत में लगा, गैस होगी। दवा ली, आराम मिला… फिर दोबारा वही हालत।
एक दिन उन्होंने मुझसे कहा:
“भाई, मैं तो सादा खाना खाता हूँ, फिर भी तबीयत क्यों बिगड़ रही है?”
जब हमने उनकी रसोई देखी, तो एक बात कॉमन थी —
हर सब्ज़ी, दाल और रोटी एक ही सस्ते ‘देसी घी’ में बनती थी, जो वो पास की दुकान से लाते थे।
यहीं से कहानी शुरू होती है।
इस PART 1 में हम समझेंगे:
- मिलावट असल में होती क्या है
- ये हमारे शरीर में सबसे पहले क्या बिगाड़ती है
- और क्यों ज़्यादातर लोग इसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं
1: मिलावट होती कैसे है? (Ground Reality)
बहुत से लोगों को लगता है कि मिलावट बस “थोड़ा सा पानी” मिलाने तक सीमित है।
हकीकत इससे कहीं ज़्यादा डरावनी है।
आज के समय में मिलावटी घी और पनीर में मिलाया जाता है:
- पाम ऑयल
- वनस्पति घी
- सिंथेटिक खुशबू
- केमिकल कलर
- नकली दूध पाउडर
एक दुकानदार ने खुद बताया (नाम नहीं लिख सकता):
“असली घी में मुनाफा नहीं है, लोग सस्ता चाहते हैं।”
यही सस्ता हमें बाद में महंगा पड़ता है — इलाज के रूप में।
2: शरीर पर पहला असर – पेट और आंतें
सबसे पहला वार होता है पाचन तंत्र पर।
मेरे एक दोस्त, सुनील (उम्र 35), ऑफिस के लंच में रोज पनीर खाता था। बाहर से मंगाया हुआ। 2-3 महीने बाद:
- पेट हमेशा फूला हुआ
- खाना पचने में दिक्कत
- सुबह उठते ही एसिडिटी
डॉक्टर ने सीधा पूछा:
“पनीर कहां से लेते हो?”
जांच में साफ निकला —
वो पनीर सिंथेटिक दूध से बना था, जिसमें स्टार्च मिला हुआ था।
❗ क्या होता है अंदर?
- आंतों की परत कमजोर होती है
- गुड बैक्टीरिया मरने लगते हैं
- गैस, कब्ज और जलन शुरू होती है
यहीं से मिलावटी घी और पनीर से होने वाली बीमारियां धीरे-धीरे जड़ पकड़ लेती हैं।
3: लोग इसे गंभीरता से क्यों नहीं लेते?
यह सबसे खतरनाक हिस्सा है।
क्योंकि:
- लक्षण धीरे आते हैं
- दर्द सहने लायक होता है
- लोग सोचते हैं “चलता है”
मेरी माँ का डायलॉग आज भी याद है:
“पहले के लोग तो और भी खराब खाते थे, हमें कुछ नहीं हुआ।”
पर सच्चाई ये है —
पहले के मिलावट और आज के मिलावट में ज़मीन-आसमान का फर्क है।
आज के केमिकल सीधे शरीर के सिस्टम से खेलते हैं।
हार्मोन, वजन और थकान: मिलावटी घी और पनीर का अंदरूनी खेल (कहानी अब और गंभीर होती है)
लेकिन असली नुकसान यहीं नहीं रुकता।
2024 की शुरुआत में मेरी कज़िन सिस्टर ने मुझसे कहा:
“मैं कुछ भी ज़्यादा नहीं खाती, फिर भी वजन बढ़ता जा रहा है… और हर समय थकान रहती है।”
उसकी उम्र सिर्फ 27 साल थी।
ना जंक फूड, ना शराब, ना स्मोकिंग।
फिर भी:
- 6 महीने में 8 किलो वजन
- सुबह उठते ही थकान
- चिड़चिड़ापन
- पीरियड्स का अनियमित होना
जब डाइट देखी गई, तो एक चीज़ कॉमन निकली —
रोज़ का मिलावटी घी और पनीर।
🧩1: मिलावटी फैट और हार्मोन का सीधा कनेक्शन
बहुत कम लोग जानते हैं कि
हमारे हार्मोन फैट पर ही सबसे ज़्यादा निर्भर होते हैं।
जब आप रोज़:
- ट्रांस फैट
- पाम ऑयल
- हाइड्रोजेनेटेड ऑयल
लेते हैं, तो शरीर कन्फ्यूज़ हो जाता है।
अंदर क्या होता है?
- थायरॉइड स्लो हो जाता है
- इंसुलिन रेसिस्टेंस बढ़ता है
- महिलाओं में एस्ट्रोजन असंतुलन
यही वजह है कि आज:
- PCOD
- अचानक वजन बढ़ना
- चेहरे पर मुंहासे
- बाल झड़ना
इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं।
🧩2: वजन क्यों कंट्रोल में नहीं रहता?
एक आम सवाल जो लोग पूछते हैं:
“मैं तो कम खाता/खाती हूँ, फिर मोटापा क्यों?”
जवाब कड़वा है —
कैलोरी नहीं, क्वालिटी गड़बड़ है।
मिलावटी घी:
- शरीर में चर्बी की तरह जमा होता है
- एनर्जी नहीं देता
- मेटाबॉलिज्म को स्लो कर देता है
मेरे एक जानकार जिम ट्रेनर ने कहा था:
“जो लोग सही खाकर भी मोटे हो रहे हैं, 70% मामलों में फैट सोर्स गलत है।”
🧩3: हर समय थकान और दिमागी सुस्ती
यह लक्षण सबसे ज़्यादा इग्नोर किया जाता है।
लोग कहते हैं:
- “काम ज़्यादा है”
- “नींद पूरी नहीं हुई”
पर असली कारण होता है —
शरीर को सही फैट नहीं मिल रहा।
मिलावटी घी:
- दिमाग को फ्यूल नहीं देता
- नर्व सिस्टम पर असर डालता है
इससे होता है:
- ध्यान न लगना
- चिड़चिड़ापन
- हल्का डिप्रेशन जैसा फील
एक IT प्रोफेशनल (बेंगलुरु) ने मुझसे कहा:
“डाइट बदली, घी-पनीर का सोर्स बदला… 15 दिन में दिमाग हल्का लगने लगा।”
🧩4: महिलाएं ज्यादा प्रभावित क्यों होती हैं?
यह बहुत ज़रूरी पॉइंट है।
महिलाओं का शरीर:
- हार्मोन-सेंसिटिव होता है
- फैट पर ज्यादा रिएक्ट करता है
इसलिए मिलावटी घी और पनीर से:
- PCOD/PCOS
- पीरियड पेन
- मूड स्विंग्स
ज्यादा देखने को मिलते हैं।
2024 के एक अनुमान के अनुसार:
शहरी भारत में हर 3 में से 1 महिला हार्मोनल समस्या से जूझ रही है,
और डाइट उसमें बड़ा कारण है।
धीमा ज़हर: मिलावटी घी और पनीर से लिवर, किडनी और कैंसर का खतरा
(यहीं से बात “बीमारी” से निकलकर जीवन–मृत्यु तक पहुँचती है)
जो दिखता नहीं, वही सबसे खतरनाक
अब सवाल यह है:
अगर कोई इंसान सालों तक मिलावटी घी और पनीर खाता रहे तो?
जवाब डरावना है —
बीमारी बाहर से नहीं, अंदर से शरीर को खोखला कर देती है।
🧩1: लिवर पर सबसे पहला और गहरा असर
लिवर हमारे शरीर का फिल्टर प्लांट है।
जो भी केमिकल हम खाते हैं, सबसे पहले वही झेलता है।
2024 में मेरे जानने वाले एक व्यक्ति, शरद जी (उम्र 52), को:
- लगातार थकान
- आंखों में पीलापन
- हल्का बुखार
रिपोर्ट आई — Fatty Liver Grade 2
जब डॉक्टर ने डाइट पूछी, तो जवाब मिला:
“घी-पनीर तो रोज़ खाते हैं, शुद्ध ही होगा।”
जांच में सामने आया कि उनका घी हाइड्रोजेनेटेड ऑयल + केमिकल फ्लेवर से बना था।
अंदर क्या होता है?
- लिवर में फैट जमने लगता है
- टॉक्सिन बाहर नहीं निकलते
- धीरे-धीरे लिवर कमजोर पड़ता है
यहीं से शुरू होता है:
- फैटी लिवर
- लिवर इंफ्लेमेशन
- आगे चलकर सिरोसिस
🧩2: किडनी पर चुपचाप हमला
बहुत कम लोग जानते हैं कि
मिलावटी फैट किडनी को भी नुकसान पहुंचाता है।
नकली घी-पनीर में मौजूद:
- भारी धातु (Heavy Metals)
- इंडस्ट्रियल फैट रेजिड्यू
ये खून के ज़रिये किडनी तक पहुँचते हैं।
पर दिक्कत यह है:
- शुरुआत में दर्द नहीं होता
- पेशाब में जलन नहीं होती
जब लक्षण दिखते हैं, तब तक:
- किडनी 30–40% डैमेज हो चुकी होती है
एक सरकारी अस्पताल के डॉक्टर ने अनौपचारिक बातचीत में कहा:
“अब किडनी के मरीज सिर्फ शुगर या BP से नहीं आ रहे, डाइट बड़ी वजह बन रही है।”
🧩3: क्या सच में कैंसर का खतरा होता है?
यह सवाल बहुत लोग पूछते हैं, पर डर के कारण सुनना नहीं चाहते।
सच सीधा है —
लगातार केमिकल सेवन कैंसर रिस्क बढ़ाता है।
मिलावटी घी और पनीर में इस्तेमाल होने वाले:
- सिंथेटिक रंग
- आर्टिफिशियल एसेंस
- ऑक्सीडाइज्ड फैट
ये शरीर में जाकर:
- कोशिकाओं (Cells) को नुकसान पहुंचाते हैं
- DNA लेवल पर असर डाल सकते हैं
🩺 विशेषज्ञ की चेतावनी
डॉ. अरुण मल्होत्रा के अनुसार:
“सीधे यह नहीं कह सकते कि सिर्फ घी-पनीर से कैंसर होता है,
लेकिन लंबे समय तक मिलावटी फैट कैंसर के लिए अनुकूल माहौल बनाता है।”
🧩4: सबसे खतरनाक बात – हमें पता ही नहीं चलता
इस पूरे पार्ट का सबसे डरावना सच यही है:
मिलावटी घी और पनीर से होने वाली बीमारियां शोर नहीं मचातीं।
कोई तेज दर्द नहीं
कोई तुरंत बेड पर गिरना नहीं
बस:
- शरीर अंदर से कमजोर होता जाता है
- रिपोर्ट धीरे-धीरे बिगड़ती है
- और एक दिन अचानक “सीरियस” हो जाती है
यही वजह है कि लोग कहते हैं:
“सब ठीक था, अचानक ये कैसे हो गया?”
Final Reality Check
मिलावटी घी-पनीर लिवर को चुपचाप खराब करता है
- किडनी पर स्लो ज़हर की तरह असर करता है
- कैंसर का रिस्क बढ़ा सकता है
- और सबसे खतरनाक — समय रहते पता नहीं चलता
सही खरीदने की पूरी गाइड
( यहीं पर ज्ञान सुरक्षा में बदलता है )
मिलावटी घी और पनीर से होने वाली बीमारियां कितनी गंभीर हो सकती हैं।
अब सवाल वही पुराना है:
“भाई, आम आदमी क्या करे? हर चीज़ की लैब टेस्टिंग तो नहीं हो सकती।”
यहीं पर ये देसी, सस्ते और रियल लाइफ टेस्ट काम आते हैं।
मैं खुद और मेरे परिवार ने इनमें से ज़्यादातर तरीके अपनाए हैं —
और कई बार गलत घी-पनीर पकड़ में भी आया है।
यहां पर मैं कुछ 5 स्टार क्वालिटी का घी आपके लिए रखा हूं, जो आप यहां से ऑर्डर कर सकते हैं
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🧩1: शुद्ध घी पहचानने के देसी टेस्ट (घर बैठे)
🧪 टेस्ट 1: हथेली वाला टेस्ट (सबसे आसान)
- एक बूंद घी हथेली पर डालिए
- 30–40 सेकंड रगड़िए
अगर घी:
- तुरंत पिघल जाए → ✔️ शुद्ध होने की संभावना
- चिपचिपा रहे → ❌ मिलावट का शक
मेरी माँ हमेशा कहती हैं:
“घी हाथ की गर्मी पहचान लेता है।”
🔥 टेस्ट 2: गरम करने का टेस्ट
- कड़ाही में थोड़ा घी डालें
- धीमी आंच पर गरम करें
ध्यान दें:
- हल्की खुशबू, साफ रंग → अच्छा संकेत
- तेज बदबू, ज्यादा धुआं → 🚨 खतरे की घंटी
मिलावटी घी अक्सर जलने लगता है।
❄️ टेस्ट 3: फ्रिज टेस्ट (रात भर)
- घी को कटोरी में रखकर फ्रिज में रखें
अगले दिन:
- पूरा समान रूप से जम जाए → ✔️
- ऊपर नीचे अलग-अलग लेयर → ❌
🧩2: पनीर पहचानने के आसान घरेलू तरीके
💧 टेस्ट 1: गरम पानी टेस्ट (सबसे भरोसेमंद)
- पनीर को गरम पानी में डालें
- 5 मिनट छोड़ दें
अगर:
- पानी साफ रहे → ✔️
- पानी में झाग/दूधिया रंग → ❌ (डिटर्जेंट/केमिकल)
मैंने ये टेस्ट दिल्ली में खरीदे पनीर पर किया था —
झाग देखकर खुद डर गया था।
🤲 टेस्ट 2: हाथ से तोड़कर देखिए
- शुद्ध पनीर थोड़ा दानेदार टूटता है
- मिलावटी पनीर रबर जैसा खिंचता है
👃 टेस्ट 3: सूंघने का टेस्ट
- असली पनीर में हल्की दूध की खुशबू
- नकली में या तो कोई खुशबू नहीं, या अजीब केमिकल स्मेल
🧩3: 🏷️ शुद्ध घी और पनीर कहाँ से लें?
यह जानना उतना ही ज़रूरी है कि बचें कैसे और खरीदें कहाँ से।
✅ 1. FSSAI लाइसेंस की जाँच करें
- पैकेट पर FSSAI लाइसेंस नंबर जरूर देखें
- यह नंबर आमतौर पर 14 अंकों का होता है
- बिना लाइसेंस या अस्पष्ट लेबल वाले उत्पादों से बचें
(यह कोई गारंटी नहीं, लेकिन पहला फिल्टर ज़रूर है)
✅ 2. भरोसेमंद और लंबे समय से मौजूद ब्रांड
- ऐसे ब्रांड चुनें जो लंबे समय से डेयरी सेक्टर में हों
- जिनका सप्लाई चेन और स्रोत स्पष्ट हो
- “बहुत सस्ता” ऑफर देने वाले नए अनजान नामों से सावधान रहें
✅ 3. Direct From Farm / Local Dairy Model
आज कई शहरों में:
- किसान-से-सीधे ग्राहक
- लोकल डेयरी कोऑपरेटिव
- या सब्सक्रिप्शन मॉडल
उपलब्ध हैं, जहाँ:
- दूध का स्रोत पता होता है
- मात्रा सीमित होती है
- मिलावट की संभावना कम रहती है
थोड़ा महंगा,
लेकिन भरोसेमंद।
🧩4: सबसे सुरक्षित तरीका – खुद बनाना (थोड़ा मेहनत, बड़ी सुरक्षा)
अगर घर में:
- छोटे बच्चे
- बुजुर्ग
- या बीमार व्यक्ति
हैं, तो हफ्ते में 1 बार खुद पनीर बनाना सबसे सेफ है।
घी के लिए:
- भरोसेमंद किसान
- या साल में 1–2 बार शुद्ध घी स्टॉक
थोड़ा महंगा पड़ेगा,
लेकिन अस्पताल से बहुत सस्ता।
🔍 PART 5 का सार (Action Summary)
इस पार्ट में आपने सीखा:
- घी और पनीर के रियल देसी टेस्ट
- खरीदते समय कौन-सी गलती न करें
- कैसे घर बैठे मिलावट पकड़ें
अब आपके पास बहाना नहीं है।
🧠 आख़िरी बात
अगर आप रोज़:
- थोड़ा कम खाएँ
- लेकिन शुद्ध खाएँ
तो शरीर खुद ठीक रहना जानता है।
याद रखिए —
मिलावटी घी और पनीर से होने वाली बीमारियां
इलाज से नहीं, सावधानी से रुकती है
⚖️ Disclaimer (कानूनी अस्वीकरण – न्यूज़ वेबसाइट हेतु)
इस लेख में जिन “2024 के अनुमान”, स्वास्थ्य रुझानों और डॉक्टरों के बयानों का उल्लेख किया गया है, वे किसी एक रिपोर्ट या व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हाल के वर्षों में सामने आई सार्वजनिक स्वास्थ्य जानकारियों, मीडिया रिपोर्ट्स और विशेषज्ञ चर्चाओं पर आधारित हैं।
- विभिन्न स्वास्थ्य रिपोर्ट्स और न्यूज़ कवरेज के अनुसार, शहरी भारत में हार्मोनल समस्याएं, फैटी लिवर और पाचन संबंधी रोग तेजी से बढ़े हैं।
- राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों और अस्पतालों से जुड़े डॉक्टर समय-समय पर मिलावटी खाद्य पदार्थों को लेकर चेतावनी देते रहे हैं।
- कई चिकित्सकीय साक्षात्कारों और स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों में यह बात सामने आई है कि खराब गुणवत्ता वाले फैट और डेयरी उत्पाद लंबे समय में शरीर को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
👉 यहाँ दिए गए आंकड़े और बयान जागरूकता के उद्देश्य से संकेतात्मक (Indicative) हैं, न कि किसी एक शोध पत्र का सीधा उद्धरण।